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दो घंटे के इलाज का 80 हजार बिल! मरीज की मौत के बाद शव रोकने के आरोप, पुलिस सख्त

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दो घंटे के इलाज का 80 हजार बिल! मरीज की मौत के बाद शव रोकने के आरोप, पुलिस सख्त

हल्द्वानी से सामने आई यह घटना न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है, बल्कि मानवता और संवेदनशीलता जैसे मूल्यों को भी कटघरे में खड़ा करती है। एक पहाड़ी महिला मरीज के साथ कथित तौर पर हुए अमानवीय व्यवहार के बाद पूरे इलाके में आक्रोश का माहौल है। मामला हल्द्वानी का है, जहां अल्मोड़ा से रेफर होकर लाई गई एक महिला मरीज की मौत के बाद निजी अस्पताल पर गंभीर आरोप लगे हैं।

 

प्राप्त जानकारी के अनुसार, अल्मोड़ा निवासी सीमा नामक महिला लंबे समय से अस्वस्थ चल रही थी। हालत बिगड़ने पर उसे बेहतर इलाज के लिए रेफर किया गया और परिजन उसे हल्द्वानी लेकर पहुंचे। पहले महिला को सुशीला तिवारी अस्पताल में दिखाया गया, जहां से आगे के उपचार के लिए निजी अस्पताल में भर्ती कराने की सलाह दी गई। इसके बाद परिजन महिला को चंदन अस्पताल लेकर पहुंचे।

 

परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में भर्ती होने के महज दो घंटे के भीतर महिला को मृत घोषित कर दिया गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इतने कम समय के इलाज के लिए अस्पताल प्रबंधन ने करीब 80 हजार रुपये का भारी-भरकम बिल थमा दिया। परिजनों का कहना है कि उन्होंने किसी तरह बिल की राशि का भुगतान भी कर दिया, लेकिन इसके बावजूद शव उन्हें सौंपने में कथित तौर पर आनाकानी की गई।

 

मामले की जानकारी मिलते ही परिजन गहरे सदमे और आक्रोश में आ गए। उनका कहना है कि एक तरफ परिवार ने अपना प्रिय खो दिया, दूसरी तरफ अस्पताल प्रबंधन का व्यवहार बेहद असंवेदनशील रहा। आरोप है कि जब तक पूरी प्रक्रिया और भुगतान को लेकर संतोषजनक स्थिति नहीं बनी, तब तक शव को रोके रखा गया, जिससे परिजनों की मानसिक पीड़ा और बढ़ गई।

यह मामला जैसे ही पुलिस के संज्ञान में आया, नैनीताल पुलिस तुरंत हरकत में आ गई। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक नैनीताल डॉ. मंजूनाथ टीसी ने बताया कि बीती रात पीड़ित पक्ष के रिश्तेदारों द्वारा पुलिस को सूचना दी गई थी। सूचना मिलते ही पुलिस टीम मौके पर पहुंची और पूरे घटनाक्रम की जानकारी जुटाई गई।

 

एसएसपी ने स्पष्ट किया कि इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया जा रहा है। पुलिस ने अस्पताल प्रबंधन से संबंधित दस्तावेज, बिलिंग विवरण और इलाज से जुड़े रिकॉर्ड की जांच शुरू कर दी है। साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि कहीं किसी प्रकार की लापरवाही, अनियमितता या नियमों का उल्लंघन तो नहीं हुआ। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित लोगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

 

इस घटना ने एक बार फिर निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली और स्वास्थ्य सेवाओं की जवाबदेही पर बहस छेड़ दी है। आम लोगों का कहना है कि इलाज के नाम पर मनमाना बिल थमाना और मरीज या उसके परिजनों के साथ असंवेदनशील व्यवहार किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। खासकर तब, जब मामला जीवन और मृत्यु से जुड़ा हो, वहां मानवीय दृष्टिकोण सबसे अधिक जरूरी हो जाता है।

 

स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने भी मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते ऐसे मामलों पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो भविष्य में गरीब और पहाड़ी क्षेत्रों से आने वाले मरीजों को और अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।

 

फिलहाल पुलिस की जांच जारी है और सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। इस पूरे प्रकरण पर जिले भर की निगाहें टिकी हुई हैं, क्योंकि यह मामला केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे समाज की संवेदनाओं और भरोसे से जुड़ा हुआ है।

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