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पत्रकारों ने अनोखे अंदाज में मनाया आईएफडब्ल्यूजे का 75वां स्थापना दिवस

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पत्रकारों ने अनोखे अंदाज में मनाया आईएफडब्ल्यूजे का 75वां स्थापना दिवस

 

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बागेश्वर, 28 अक्टूबर। उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की बागेश्वर जिला इकाई ने इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स यानी आईएफडब्ल्यूजे का 75वां स्थापना दिवस इस बार कुछ अलग और प्रेरणादायक तरीके से मनाया। जिले के पत्रकारों ने यूनियन के अध्यक्ष किशन सिंह मलड़ा और वरिष्ठ पत्रकार रमेश पाण्डे ‘कृषक’ की अगुवाई में वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें पर्यावरणीय दृष्टि से बहुउपयोगी सिलंग का पौधा लगाया गया।

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सिलंग का पेड़ पर्यावरण के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है। यह न केवल हवा को प्रदूषण मुक्त करता है, बल्कि जल संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाता है। आर्थिक रूप से भी यह पेड़ उपयोगी है। जब सिलंग में फूल खिलते हैं तो उसकी सुगंध छह से सात किलोमीटर तक फैल जाती है। इसके फूलों से मिठाई, सुगंधित तेल और उच्च गुणवत्ता वाली चाय तैयार की जाती है। कई स्थानों पर इसके फूलों का उपयोग वस्त्रों को कीड़ों से सुरक्षित रखने के लिए भी किया जाता है। इसी प्रतीक के रूप में पत्रकारों ने यह संदेश दिया कि जैसे सिलंग का पेड़ समाज को महकाता है, वैसे ही आईएफडब्ल्यूजे भी पत्रकारिता जगत में अपनी पहचान की महक बनाए रखे।

 

इस मौके पर स्थापना दिवस के अवसर पर एक गोष्ठी भी आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता यूनियन के जिलाध्यक्ष किशन सिंह मलड़ा ने की। गोष्ठी में 75 वर्ष पूर्व आईएफडब्ल्यूजे की नींव रखने वाले सभी ज्ञात एवं अज्ञात मूर्धन्य पत्रकार पुरखों को श्रद्धांजलि दी गई। उपस्थित पत्रकारों ने संगठन को मौजूदा मुकाम तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाने वाले स्वर्गीय डॉक्टर के. विक्रमराव को भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की।

 

गोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार रमेश पाण्डे ‘कृषक’, यूनियन की जिला उपाध्यक्ष सीमा खेतवाल, सचिव दीपक जोशी, कोषाध्यक्ष मनोज टंगड़िया, रमेश पर्वतीय, कृष्णा गड़िया, भगवत नेगी और विपिन जोशी ने भी अपने विचार साझा किए। सभी ने एक स्वर में निर्णय लिया कि श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की बागेश्वर इकाई पूरे वर्ष को ‘पर्यावरण संरक्षण वर्ष’ के रूप में मनाएगी। इस दौरान वर्षभर पर्यावरण हितैषी पौधों का रोपण किया जाएगा।

 

कार्यक्रम को सफल बनाने में किशन राम, सूरज, जोगा गिरी, कैलाश गिरी (पूर्व प्रधान मण्डलसेरा) का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। यह आयोजन न केवल पत्रकारिता के मूल्यों को मजबूत करने का प्रतीक बना, बल्कि समाज के लिए एक प्रेरणादायक संदेश भी छोड़ गया कि जब कलम और प्रकृति साथ चलते हैं, तो बदलाव निश्चित होता है।

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