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    रिपोर्ट – हरीश जोशी , मेरा हक़ न्यूज़ गरुड़

      अल्मोड़ा जिले के एक छोटे से गांव खैराकोट में जन्मा एक बालक, जिसने न केवल शिक्षा के क्षेत्र में अपना परचम लहराया, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का भी एक मजबूत स्तंभ बना… वो अब हमारे बीच नहीं रहा। हम बात कर रहे हैं प्रोफेसर पूरन चंद्र जोशी की, जिनका बीती रात दिल्ली में आकस्मिक निधन हो गया। उनके जाने से न केवल शिक्षा जगत बल्कि समूचा उत्तराखंड स्तब्ध है।

       साल 1956 में खैराकोट गांव में प्रेमबल्लभ जोशी और रेवती जोशी के घर जन्मे पूरन बचपन में ही पिता की नौकरी के चलते दिल्ली आ गए। दिल्ली की तंग गलियों और सरकारी क्वार्टरों के बीच उन्होंने पढ़ाई की, स्कूल बदले, लेकिन अपने जज़्बे को कभी नहीं डगमगाने दिया। एक हालिया साक्षात्कार में उन्होंने खुद कहा था कि वो हमेशा टॉपर रहते थे — और ये बात उनके जीवन के हर मोड़ पर सच साबित हुई।

        दिल्ली यूनिवर्सिटी से मानव विज्ञान यानी एंथ्रोपोलॉजी में पढ़ाई करने के बाद उन्हें गढ़वाल विश्वविद्यालय में पढ़ाने का अवसर मिला। वर्ष 1985 से 2003 तक उन्होंने गढ़वाल यूनिवर्सिटी में जो योगदान दिया, वो आज भी वहां के विद्यार्थी और अध्यापक याद करते हैं। उन्होंने न केवल पढ़ाया, बल्कि पढ़ाई को रुचिकर और जनमानस से जुड़ा बनाया।

          लेकिन प्रोफेसर पूरन सिर्फ एक शिक्षक नहीं थे। वो पर्यावरण की लड़ाई में भी आगे रहे। उन्होंने सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट और गौरा देवी जैसे पर्यावरण योद्धाओं के साथ मिलकर ‘डालियों का दगड़िया’ जैसी संस्थाओं के माध्यम से जनजागरण किया। ‘शैलनट’ संस्था के जरिए उन्होंने थियेटर और लोकसंस्कृति को भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

         साल 2003 में जब वो दिल्ली यूनिवर्सिटी लौटे तो उन्होंने देश-विदेश में अपनी ख्याति बनाई। वे मानविकी विभाग के प्रमुख बने, विश्वविद्यालय के कार्यवाहक कुलपति रहे और अनेकों राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के सलाहकार भी रहे। लेकिन इस सबके बीच भी उनका मनान गांव से रिश्ता कभी नहीं टूटा। कुमाऊनी बोली को वो हमेशा अपनी बातचीत में स्थान देते रहे। चाहे कितनी ही ऊंचाइयों पर क्यों न पहुंचे, अपनी जड़ों से जुड़े रहे।

आज उनके आकस्मिक निधन की खबर सुनकर मनान गांव में शोक की लहर दौड़ गई है। गांव वालों की आंखें नम हैं, और उनके साथ बिताए लम्हों को याद करते हुए हर कोई यही कह रहा है — “वो सिर्फ प्रोफेसर नहीं, हमारे अपने थे।”

उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में किया गया, लेकिन उनकी स्मृतियां कुमाऊं की पहाड़ियों, गढ़वाल की घाटियों और दिल्ली की गलियों में हमेशा जीवित रहेंगी।

पूरन चंद्र जोशी जैसे लोग बार-बार जन्म नहीं लेते। उन्होंने जो विरासत छोड़ी है, वो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी।

श्रद्धांजलि एक ऐसे कर्मयोगी को, जो हर दिल में बसता था, और अब हमेशा के लिए यादों में समा गया।

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